वासंतीय सूर्य षष्ठी (चैती छठ)
वासंतीय सूर्य षष्ठी (चैती छठ)
चैत्र शु.प. ६ (१२ अप्रैल)
छठ पूजा के दिन माता छठी की पूजा की जाती है, जिन्हें वेदों के अनुसार उषा (छठी मैया) कहा जाता है तथा शास्त्रों के अनुसार उन्हें सूर्य देव की पत्नी कहा गया है । पुराणों में इस दिन सूर्य देवता की पूजा का महत्त्व मिलता है । छठ पूजा वर्ष में दो बार अर्थात चैत्र शुक्ल पक्ष की षष्ठी को चैती छठ और कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को कार्तिक छठ पूजा की जाती है ।
छठ पूजा व्रत विधि
यह पर्व चार दिन का होता है और बडे ही उत्साह के साथ मनाया जाता है । उत्तर भारत में इस दिन गंगास्नान का भी विशेष महत्त्व है । यह व्रत स्त्री-पुरुष दोनों करते हैं । यह चार दिवसीय त्यौहार का माहत्मय इस प्रकार है –
पहला दिन
नहाय खाय । इस दिन सूर्र्योदय के पूर्व पवित्र नदियों में स्नान करने के पश्चात ही भोजन करते हैं जिसमें कद्दू (लौकी) खाने का विशेष महत्त्व पुराणों में है ।
दूसरा दिन
खरणा, इस दिन सवेरे से निर्जला उपवास कर पूरी पवित्रता के साथ सायंकाल को रोटी एवं गुड की खीर बनाते हैं ।
तीसरा दिन
इस दिन डूबते हुए सूर्य को अर्ध्य अर्पण करते हैं, प्रात:काल स्नान करके प्रसाद (ठेकुआ) बनाते हैं । इस प्रसाद को बनानेवाले सभी निर्जला रहकर ही बनाते हैं । तदुपरांत बांस अथवा पीतल के सूप में, उस मौसम में उपलब्ध सभी फलों के साथ ठेकुआ रखकर सूपों को अंतिम रूप देकर बांस की बडी सी टोकरी में रख नदी या तालाब पर जाते हैं । वहां व्रती स्त्री / पुरुष नदी में स्नान कर गीले वस्त्रों में ही भगवान सूर्य को अर्ध्य अर्पण कर वापस घर आते हैं ।
चौथा दिन
इस दिन प्रात: चार बजे पुन: नदी पर जाते एवं उगते सूर्य को अर्ध्य अर्पण करते हैं और तत्पश्चात घर वापस आते हैं । इस प्रकार चार दिनों का यह महापर्व संपन्न होता है ।
छठ व्रत के नियम
१. इसे घर की महिलाएं एवं पुरुष दोनों करते हैं ।
२. इसमें स्वच्छ एवं नए तथा बिना सिले वस्त्र पहने जाते हैं जैसे महिलाएं साडी एवं पुरुष धोती पहनते हैं ।और व्रत करनेवाले व्रत की अवधि में धरती पर कंबल एवं चटाई प्रयोग कर सोते हैं ।
३. इन दिनों घर में प्याज, लहसुन एवं मांस-मछली आदि का प्रयोग निषिद्ध है ।
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