आयुर्वेद केनियम
- दैहिक दुःख
- दैविक दुःख
- भौतिक दुःख
भोजन और औषधी मे अंतर है .भोजन पुरे दिन मे कभी भी खा सकते है ,लेकिन औषधी सुबह सुबह हि खाली पेट ले |
आयुर्वेद हजारो वर्षो से इस देश कि संस्कृती ,परंपरा ,हमारी दिनचर्या ,ऋतुचर्या ,हमारे देश -काल के अनुकूल ,हमारे शरीर के अनुकूल है | और हमारे खान पान गुणधर्म से परिचित है ,रहन सहन के गुणधर्म से परिचित है | आयुर्वेद एक संपूर्ण ज्ञान विज्ञान शास्र है आयुर्वेदिक शारीरिक स्वस्थता का विश्वास दिलाता है|
कोई भी रोग शरीर मे आता है तो उसकी पृष्ठभूमी होती है और रोग शरीर मे जब आता है तो पहले हमे चेतावणी देता है अप संभल जाईये अन्यथा आज बडा रोग आने वाला है |किसी भी रोग को दबाइये मत या उसे नजरअंदाज मत करिये नहीं तो रोग धीरे धीरे बढ जायेगा |
शरीर को स्वस्थ्य रखने मे भोजन अहम भूमिका निभाता है भोजन शरीर के लिये है शरीर भोजन के लिये नहीं है हम जीवित रहने के लिये भोजन करते है ,भोजन के लिये जीवित मत रहिये | अत: अभक्ष्य भोजन ना करे, जिव्हा के स्वाद के लिये दूषित भोजन ना करे ,विपरीत भोजन ना करे ,इच्छा ना होणे पर भोजन ना करे ,ठुस ठुस कर भोजन ना करे आवश्यक्ता से काम मत करे ,गलत समय पर मत करे ,पहले के भोजन के पचन के बाद हि दुसरा भोजन करे ,मौसम के अनुकूल सुपाच्य भोजन करिये ,शांत और प्रसन्न मन से तथा तणाव मुक्त होकर भोजन करिये , भोजन बलवर्धक और संतुष्टी प्रदान करणे वाला होना चाहिये |
जो दोपहर के भोजन के बाद मठ्ठा (छाछ) पिता है ,रात्री मे सोते समय दूध पिता है एवं प्रातः उठते हि पाणी पिता है उसे कोई रोग नहीं होता | मठ्ठा (छाछ) पिणे से रोग ऐसे जल जाते है फार वापस नहीं आते, मठ्ठा (छाछ) पिणे वाले को फार कोई रोग नहीं होता |जिस प्रकार देवताओ के पास अमृत है उसी प्रकार मनुष्य के पास मठ्ठा (छाछ) हि अमृत है |
आलस्य शरीर का सबसे बडा शत्रू है आप अपना कार्य जिस क्षेत्र मे भी है इमानदारी और निष्ठापूर्वक करिये |अति व्यस्तता या अत्याधिक श्रम भी रोग लता है इसलिये मध्यम बनिये | कार्य के बीच -बीच मे थोडा -थोडा आराम करिये |शरीर को अतिरिक्त ऑक्सिजन कि आवश्यकता होती है सुबह -सुबह योगा या व्यायाम करे |
रात को देर तक काम ना करे ,रात को शीघ्र सोये ,ब्रह्म मुहूर्त मे सूर्य उगने से पहले उठ जाये |सूर्य उगने के बाद उठने पर मल का ऑंत चुसने लागती है |
विचार मनुष्य का निर्माण करता है अच्छा सोचिये ,अच्छा काम करिये ,दया धर्म पर चलिये ,मन को शांत रखे | चिंता एवं क्रोध शरीर का नाश करते है मनुष्य के धर्म कर्म का नाश क करते है | अपने माता पिता का सम्मान करे ,अपने गुरु का सम्मान करे,अपने पडोसी का सम्मान करे ,अपने भाई बंधुओ का सम्मान करे और जिस धर्म मे पैदा हुए हो उस धर्म का सम्मान करे ,धर्म पर चलिये दान-धर्म किजीये |
हमेशा साफ-स्वच्छ और सुती वस्र पहनें |
स्नान के पूर्व और भोजन के पश्चात पेशाब अवश्य करे|
सूर्य कि ओर मुह करके तथा बरगद,पीपल ,देव मंदिर ,नदी और शमशान मै पेशाब ना करे |
धन और अन्न प्रयोग मै ,विद्या सिखने मै ,भोजन करणें मै जो संकोच नही करता वाह व्यक्ती सुखी राहता है |जो व्यक्ती यह सोचता है मुझे ना तो राज्य चाहिये ,ना स्वर्ग चाहिये केवल दुखी लोगो का दुःख दूर करू वही व्यक्ती सुखी राहता है |
सूर्य, जल, गाय, अग्नी, घी, इत्यादी का दर्शन आयुष्य बडता है |
फलो का रस ,तेल कि चीजे ,मठ्ठा , खट्टी चीजे रात मै नही खानी चाहिये |
घी या तेल कि चीजे खाने के बाद पाणी नही पिना चाहिये एक घंटे बाद पीए|
सुबह और दोपेहेर के भोजन के तुरंत बाद तेज चलाना और दौड़ना हानिकारक है | १० मिनटं वज्रासन मै बैठे फिर २० मिनिट वाम मुद्रा मै सोये या आराम करे |
शाम के भोजन के बाद शुद्ध हवा मै तेहेलना चाहिये कम से कम ५०० ते १००० कदम चलाना चाहिये | शाम के भोजन के तुरंत बाद कभी नही सोये |पेट कि समस्याये हो जाती है |
तेज धूप मै चालणे के बाद ,शारीरिक मेहेनत के बाद या शौच जाणे के तुरंत बाद पाणी कभी नही पिना चाहिये |
सिर पर कपडा बांधकार कभी नही सोना चाहिये |
रोगी को हमेशा गर्म अथवा गुणगुणा पाणी हि पिलाना चाहिये | रोगी को थंडी हवा ,अधिक परिश्रम तथा क्रोध से बचना चाहिये |
दावा को तरल पदार्थ मै मीलाना हो तो चाय ,कॉफी या दूध मै कभी ना मिलाये |दावा को नारियल पाणी ,छाछ या साधें पाणी मीलाकर पिना चाहिये|
१४ आधारणीय है ये वेग आ राहे है तो इन्हे कभी नही रोकना चाहिये रोखणे शरीर मै कई रोग आते है और जबरदस्ती करणें पर भी रोग आते है |
१) हंसी २) अपान वायू ३) मल ४) मूत्र ५) छिक ६)प्यास ७) भूख ८) निद्रा ९)खांसी १०) श्रमज ११) जम्भाई १२) अश्रू १३) वामन १४) वीर्य योग
हमारे शासरो मै दस पाप कर्म बतायें गाये है इन्का शरीर ,वचन और मन से त्याग करना चाहिये |१)हिंसा:जीव-जंतू को मरणा २)चोरी करना ३)व्यर्थ क कार्य जिसका कोई फल ना हो ४)चुगली करना५)कठोर वचन बोलना ६)झूठ बोलना ७)ऐसा बोलना जिसे दो मित्रो मै झगडा हो ८)मारना-पीटना ९)दुसरे कि संपत्ती छिन लेना १०)विपरीत समझ, माता पिता को उलटा समझणा
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